जीन्स का इतिहास

उत्तरी अमेरिका जींस के लिए वैश्विक खरीद का 39% हिस्सेदार है, इसके बाद पश्चिमी यूरोप 20%, जापान और कोरिया में 10% और बाकी दुनिया 31% पर है। संयुक्त राज्य अमेरिका के कंस्यूमर ने 2004 में जींस पर 14 अरब अमेरिकी डॉलर और 2005 में 15 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक खर्च किए थे।

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जीन्स का इतिहास

जीन्स आज के मॉडर्न समय एक ऐसा पहनावा जिसे बच्चे हो या बड़े, लड़के हो या लड़कियाँ सभी पहनाना पसंद करते है|जीन्स को जितना फैशन के लिहाज़ से देखा जाता है उतना ही इसे आरामदायक भी माना जाता है| इसे ना ही प्रेस करने की ज़रूरत और ना ही यह सोचने की इसे किस दूसरे कपड़े के साथ पहना जाए| शर्ट या टी-शर्ट, टॉप हो या कुर्ती ये सब कपड़ों के साथ अपनो चका-चक दिखती है|  पर क्या आपको पता है कि जीन्स का प्रचलन कहाँ से आया है|

मूलतः जीन्स को उन लोगों के लिए बनाया गया था जोकि बहुत मेहनत का काम करते थे पर 1950 के दशक में यह पहनावा कम उम्र और या यूँ कह लीजिए कि किशोर आयु के लोगों के बीच अधिक प्रचलित  हो गया था|

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ऐतिहासिक ब्रांडों में लीवाइस, जोर्डक़ और रैंगलर शामिल हैं। जीन्स आज एक बहुत ही लोकप्रिय अनौपचारिक (इन्फ़ॉर्मल) परिधान है जिसे दुनिया भर मे कई शैलियों और रंगों मे प्रचलित है। ” नीले रंग की जींस ” की पहचान विशेष रूप से अमेरिका की संस्कृति के साथ, विशेष रूप से पुराने वेस्ट (पश्चिम) अमेरिका के साथ जुडी़ है।

Levi’s का लोगो

अगर लोगों से पूछा जाए कि वे जींस क्यों पहनते हैं, तो उनसे अलग-अलग तरह के जवाब मिलेंगे। कुछ लोगों को जीन्स पहनने में आसान, आरामदायक और ज्यादा चलने वाली पोशाक है, वहीं कुछ को इसका लुक भाता है। अलग-अलग लोगों के लिए जींस के मायने अलग हैं। अलग-अलग लोगों के लिए इसके मायने भी अलग हैं। ′ब्लू जींस′ नाम की किताब लिखने वाले मानव विज्ञानी डेनी मिलर कहते हैं- “जींस की व्यापक पसंद के कारणों पर अभी तक बहुत ज्यादा अध्ययन नहीं हुआ है।”

जीन्स का इतिहास

जीन्स के इतिहास पर नज़र डालें तो हमारे सामने 16 वीं शताब्दी का भारतीय निर्यातित मोटा सूती कपडा़ आता है जिसे डुंगारी कहा जाता था। बाद मे इसे नील के रंग में रंग कर मुंबई के डोंगारी किले के पास बेचा गया था। नाविकों ने इसे अपने अनुकूल पाया और इससे बनी  पैंटें पहनने लगे।

जीन्स का कपडे़ का निर्माण 1600 की शुरुआत मे इटली के एक कस्बे ट्यूरिन के निकट चीयरी में किया गया था। इसे जेनोवा के हार्बर के माध्यम से बेचा गया था, जेनोवा एक स्वतंत्र गणराज्य की राजधानी थी जिसकी नौसेना काफी शक्तिशाली थी। इस कपडे़ से सबसे पहले जेनोवा की नौसेना के नाविको की पैंट बनायी गयीं क्योंकि इसके नाविको को ऐसी पैंट चाहिये थी जिसे सूखा या गीला भी पहना जा सके तथा इसके पौचों को पोत के डेक की सफायी के समय उपर को मोडा़ जा सके। इन जींसो को सागर के पानी से एक बडे़ जाल में बाँध कर धोया जाता था और समुद्र के पानी उनका रंग उडा़कर उन्हें सफेद कर देता था। जींस का नाम कई लोगों के अनुसार जेनोवा के नाम पर पडा़ है।

जींस बनाने के लिये कच्चा माल फ्रांस के निम्स शहर से आता था जिसे फ्रांसीसी मे दे निम कहत थे इसीलिये इसके कपडे़ का नाम डेनिम पड़ गया। परिधान के रूप में जींस के प्रचलन की बात करें तो, इसका श्रेय लेवी स्ट्रास नाम के एक यहूदी युवा को जाता है, जो वर्ष 1851 में जर्मनी से अमेरिका आकर बस गए थे। लकड़हारों और खदानों में काम करने वाले मजदूरों के लिए पैंट बनाने के लिए मजबूत किस्म का मैटीरियल खोजते हुए स्ट्रास ने जींस का निर्माण किया।

भारत में पहली ब्रांडेड जीन्स साल 1995 में अरविंद मिल्स ने लांच की। अरविंद मिल्स को देखकर कई और मल्टीनेशनल कंपनियों, जैसे, ’ली और ‘लिवाइस  ने बाजार में अपनी जीन्स उतारीं।

अरविन्द मिल्स

कैलविन क्लेन और जीएएस जैसे कई लग्जरी ब्रांड बाद में आए। आज यहां जीन्स का बाजार लगभग 6000 करोड़ रुपये का है। लंदन की मार्केट इंटेलीजेंट फर्म यूरोमॉनिटर के अनुसार, 2010-2015 के बीच सीएजीआर (कंपाउंड एन्युअल ग्रोथ रेट) ने जीन्स मार्केट में भारत में 11 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की है।

 

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