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गाेबर से उपले बनाती हैं, फिर खुद के कियोस्क पर करती हैं नेट बैंकिंग, वहीं तनुजा बिना हार्डवेयर का कोर्स किए सुधार रहीं खराब कम्प्यूटर

आज विश्व कम्प्यूटर साक्षरता दिवस है। हम आपको दो ऐसी महिलाओं के बारे में बता रहे हैं, जो कम्प्यूटर चलाना सीखकर और इसके बारे में जानकर खुद को दूसरों से आगे और अलग साबित कर रही हैं। एक महिला गांव की है, जो घर के काम करती है, खेत का काम करती है, मवेशी संभालती है और उसके साथ ही कियोस्क सेंटर पर कम्प्यूटर से बैंकिंग का काम भी कर रही है। दूसरी महिला है शहर के राधाकृष्ण मार्ग की तनुजा त्रिवेदी। उनके पास कम्प्यूटर से जुड़ी कोई डिग्री नहीं, लेकिन हार्डवेयर के मामले में उन्हें महारत हासिल है। कम्प्यूटर, प्रिंटर, लैपटॉप से लेकर सीसीटीवी कैमरों की सारी बीमारी चुटकियों में दूर कर देती हैं। 

दिव्यांग मड़ीबाई : लोन पर लिया लैपटॉप, परिवार को बनाया समृद्ध

सुदूर बसे गांव सारसवाट की दिव्यांग महिला गोबर से उपले भी बनाती हैं और कम्प्यूटर भी चलाती हैं। उनका ये हुनर परिवार को आर्थिक समृद्धि दे रहा है। मड़ी नलवाया बीए तक पढ़ी हैं। 2012 में उनकी शादी सुनील से हुई। सुनील भी दिव्यांग हंै। मड़ी अपने पति सुनील के साथ निजी कंपनी के टाॅवर पर गार्ड की नौकरी में साथ देती थीं। गांव में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अधिकारियों ने स्व. सहायता समूह में मड़ी को शामिल कर दिया। रामदेव महिला बचत समूह में मड़ी ही पढ़ी-लिखी थी। अफसरों ने उसे बताया कि कम्प्यूटर खरीदने के लिए बैंक से लोन मिल सकता है। बस यहीं से मड़ी की आंखों में सुनहरे भविष्य के सपने सजने लगे। वे कम्प्यूटर ट्रेनिंग के लिए झाबुआ जाने लगीं। लोन मिला तो लैपटॉप, प्रिंटर, यूपीएस खरीदे। 2016 में उसे बैंक आईडी मिल गई। धीरे-धीरे काम शुरू हुआ। बैंक में खाता खोलना, खाते में ट्रांजेक्शन करना, बीमा करवाना आदि काम करने लगीं। वे अब तक 2200 खाते खोल चुकी हैं। करीब 12 हजार रु. महीना कमा रही हंै। अब मड़ी के पति सुनील गांव के ही स्कूल में अतिथि शिक्षक बन गए हैं। 2 बेटियों को अच्छे स्कूल में पढ़ाकर भविष्य संवारना चाहते हैं।
 

तनुजा : कम्प्यूटर की डिग्री नहीं, लेकिन हार्डवेयर में महारत हासिल

ये कहानी है तनुजा त्रिवेदी की। मंदसौर के पास सीतामऊ से शादी के बाद झाबुआ आई। बीए तक पढ़ी हैं। 2004 में शादी हुई और पति विशाल त्रिवेदी ने इसी साल कम्प्यूटर हार्डवेयर की दुकान खोली। 2009 में विशाल का एक्सीडेंट हो गया। ऐसे में दुकान संभालने में परेशानी आने लगी। कुछ दिन में विशाल पत्नी तनुजा को साथ लेकर दुकान जाने लगे। विशाल तनुजा को कम्प्यूटर सुधारना बताते और उनके बताने के हिसाब से तनुजा कम्प्यूटर का काम करती। कुछ दिन में वो कम्प्यूटर की हर बीमारी समझने लगी और उसका इलाज भी। इसके पहले कम्प्यूटर से तनूजा का कुछ लेना-देना नहीं था, लेकिन 6 महीने में ही सबकुछ सीख लिया। अब दुकान का सारा काम भी संभाल लेती हैं। पति के साथ दुकान संभालने हर दिन आती हैं। सुबह बच्चों को तैयार करके स्कूल भेजना, खाना बनाना, घर की सफाई करना और पति के साथ दुकान जाना। रात तक उनके साथ काम करके घर लौटना, ये उनकी दिनचर्या हो चुकी है। तनुजा बताती है, डिजिटल रूप से काम करने वाली कई मशीनें सुधार सकती हूं। कभी-कभार 15 से 20 केस भी आ जाते हैं।

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