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दुनिया की 80% आबादी करती है कीटों का सेवन

  • भारत के बड़े हिस्से में तो नहीं लेकिन देश के पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर अरुणाचल व नगालैंड में पोषक तत्वों से युक्त कीटों का बाजार लगता है।

भविष्य में खाद्य संकट की चुनौती से निपटने में कीटाहार कितना कारगर होगा, इसकी संभावनाएं तलाशने और ऐसी कीट प्रजातियों का वजूद बचाने की दिशा में भारत में अपने तरह का पहला प्रयास शुरू किया गया है। उत्तर-पूर्व के राज्यों में खाने योग्य कीटों पर शोध किया जा रहा है।  खाद्य संकट और खासतौर पर पोषण की कमी से निपटने के लिए देश-दुनिया में नित नए शोध हो रहे हैं।

वैज्ञानिकों की नजर अब उन कीटों पर टिक गई है, जो पारंपरिक भोजन का अभिन्न हिस्सा ही नहीं, बल्कि पोषक तत्वों की पूर्ति भी कर सकते हैं। लगातार उपभोग से इन कीटों व जंतुओं का वजूद ही खतरे में न पड़ जाए, इसके लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने अनूठा अनुसंधान शुरू कर दिया है। खास बात कि राष्ट्रीय अध्ययन मिशन के तहत इस अनुसंधान की अगुआई उत्तराखंड के अल्मोड़ा स्थित जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण शोध एवं सतत विकास संस्थान कर रहा है।

दुनिया की 80 फीसद आबादी करती है कीटों का सेवन

दरअसल, दुनिया की 80 फीसद आबादी परंपरागत भोजन के रूप में कीटों का सेवन करती है। भारत के बड़े हिस्से में तो नहीं, लेकिन देश के पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर, अरुणाचल व नगालैंड में पोषक तत्वों से युक्त कीटों का बाजार लगता है। वहीं, तमिलनाडु, केरल, ओडिशा और झारखंड में भी भोजन व उपचार आदि में इनका प्रयोग किया जाता है। पड़ोसी देश चीन में बहुतायत उपयोग के बाद भी निर्यात तक होता है। आने वाले समय में नियमित व अधिक भक्षण से इन कीटों की प्रजातियां खत्म न होने लगें, इसे लेकर वैज्ञानिक चिंतित भी हैं।

कीटों का संरक्षण

कीटों के जरिये प्रोटीन व अन्य पोषक तत्वों की पूर्ति, भविष्य में एक बेहतर पोषाहार की संभावनाएं तलाशने, आजीविका से जोड़ने के साथ इन कीटों के संरक्षण के मकसद से ही राष्ट्रीय अध्ययन मिशन के तहत हिमालयी राज्यों में अनुसंधान शुरू किया गया है। नोडल संस्थान जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयन पर्यावरण शोध व सतत विकास संस्थान के प्रोजेक्ट पर मणिपुर में खाने योग्य कीटों पर सघन शोध किया जा रहा। इसमें कृषि एवं वानिकी कॉलेज केंद्रीय विवि पासीघाट अरुणाचल तथा अशोक ट्रस्ट पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण शोध संस्थान, बेंगलुरु के वैज्ञानिक अहम भूमिका निभा रहे हैं।

अब तक 439 विभिन्न कीट प्रजातियां चिह्नित

वैज्ञानिकों की मानें तो पूर्वोत्तर राज्यों के इन कीटों का आसान खाद्य पदार्थ के साथ उच्च ऊर्जा व प्रोट्रीन के प्रबल स्नोत के रूप में उपयोग हो सकता है। अब तक 439 विभिन्न कीट प्रजातियां चिह्नित की जा चुकी हैं। इन्हें संरक्षित कर खाद्य नमूने बना सतत उपयोग, उपभोग व प्रबंधन के साथ कीट पालन की वैज्ञानिक तकनीक विकसित की जाएगी। उम्मीद की जा रही कि पोषाहार के रूप में कीटाहार पर अनुसंधान मील का पत्थर साबित होगा।

बनेगा डिजिटल कीट पुस्तकालय व संग्रहालय

कौन से कीट जहरीले हैं और कौन सी किस्में खाने योग्य हैं, राष्ट्रीय हिमालयी मिशन के तहत देश की पहली ऑनलाइन कीट लाइब्रेरी व संग्रहालय भी तैयार किया जा रहा।

दुनियाभर में कीटों की 1500 से ज्यादा प्रजातियां मानव खाद्य पदार्थ के रूप में उपयोग कर सकते हैं। भारत में ही करीब 100 से अधिक कीट प्रजातियां खाने योग्य हैं और अनेक प्रजातियों का रासायनिक अध्ययन भी किया जा रहा है। वहीं, परंपरात ज्ञान को संकलित कर कीट प्रजातियों से प्राप्त प्रोटीन को संग्रहित कर करने पर भी अनुसंधान किया जा रहा है।

– डॉ. पी शांति बाला, परियोजना वैज्ञानिक

राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन के तहत प्रोजेक्ट में पूर्वोत्तर राज्यों में यह अनुसंधान होना है, जहां विभिन्न कीट खाद्य का हिस्सा हैं। मकसद पोषण की कमी को पूरा कर कीटों का संरक्षण करना भी है।

– प्रो. किरीट कुमार, नोडल अधिकारी राष्ट्रीय

हिमालयी अध्ययन मिशन

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