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महराष्ट्र में गठबंधन टूटने का दोषी कौन?

पिछले 17 दिनों से चल रही खीचतान आज 30 साल पुराने गठबंधन के टूटने तक आ गई है. केंद्र में बहुमत हासिल कर सरकार बनाने वाली भाजपा महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ गठबंधन में अपने आप को हमेशा बड़े भाई की जगह रखती आई है, जिसे शिवसेना ने भी स्वीकार कर रखा था.

लेकिन 2019 विधानसभा चुनाव में परिणाम इस कदर आए कि जनता ने दोनों भाइयों को आइना दिखा दिया. किसी को बहुमत नही मिलने से न केवल फडनवीस को इस्तीफा देना पड़ा बल्कि बात कुर्सी से उठ कर अहम् पर आ गई.

अमित शाह के इतिहास को देखें तो उन्होंने झुकने के लिए कभी हामी नही भरी, लेकिन जिस भी क्षेत्रीय दल के साथ चुनाव लड़ा और सरकार बनाई उस दल के वोटर पर भी कब्ज़ा कर लिया. हरियाणा में इनोलो, और महाराष्ट्र में शिवसेना खुद इस निति की शिकार हो रही है. जम्मू कश्मीर में भी महबूबा के साथ हाथ सिर्फ पैर रखने के लिए मिलाया, फिर उन्हें ही जेल में डाल दिया.

इस चाल से चलते अमित शाह ने सिरे से ख़ारिज किया की शिव सेना को मुख्यमंत्री पद दिया जाएगा, जबकि शिव सेना पहले कभी ऐसा नही कहा, न किया, लेकिन यदि उद्धव ठाकरे अपनी बात पर अड़े हैं मतलब 50-50 निराधार तो नही होगी.

राजनीती की इस खीचतान पर गौर करें तो भाजपा अहंकार में और शिवसेना जिद में है. भाजपा के अहंकार का कारण अमित शाह हैं तो शिवसेना की जिद का कारण वो बात जिससे भाजपा मुकर रही है.

शिवसेना ने स्पष्ट राजनीती की है, इसलिए मौका देखकर ऑंखें दिखाने की बात शिवसेना पर सटीक नही बैठती. लेकिन यदि दोनों पक्षों को देखें तो आखिर में दोनों अपनी जगह जिस तरह अड़े हैं किसी एक को झूठा ठहराना जल्दबाजी होगी.

ऐसी हालत में महाराष्ट्र में राजनीती के इस खेल के लिए और कोई नही महाराष्ट्र की जनता जिम्मेदार है. जनता ने शायद सोच समझकर और गिन कर सीट नही दी होंगी लेकिन जिस विचार से वोट किया है उससे ज़ाहिर है की जनता भी देखना चाहती है की जो चेहरे धुल कर सामने आएँगे वो कल तक कैसे थे.

हरियाणा के दुष्यंत चौटाला की तरह गिरगिट को शर्म से पानी पानी कौन करता है, ये कुछ दिन में ज़ाहिर हो जाएगा.

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