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राफेल पर पुनर्विचार याचिका सुप्रीम कोर्ट में ख़ारिज

  • सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी के ‘चौकीदार चोर है’ बयान पर माफी मंजूर की, आगे सावधानी बरतने के लिए कहा.
  • राहुल ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा था- सुप्रीम कोर्ट ने मान लिया है कि चौकीदार ही चोर है.
  • कोर्ट ने 14 दिसंबर 2018 को दिए गए अपने आदेश में राफेल डील को तय प्रक्रिया के तहत होना बताया था, सरकार को क्लीनचिट दी थी.
  • इस आदेश के खिलाफ वकील प्रशांत भूषण, पूर्व मंत्री यशवंत सिन्हा और अन्य ने पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल कीं.

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राफेल मामले में दायर पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस केएम जोसेफ की बेंच ने 14 दिसंबर 2018 को सुनाए गए फैसले को बरकरार रखा। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि हमें इस मामले में एफआईआर का आदेश देने या जांच बैठाने की जरूरत महसूस नहीं हुई।

शीर्ष अदालत ने पिछले साल के फैसले में राफेल डील को तय प्रक्रिया के तहत बताया था और सरकार को क्लीनचिट दी थी। कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के बाद 10 मई को फैसला सुरक्षित रख लिया था।वकील प्रशांत भूषण, पूर्व मंत्री यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी समेत अन्य ने राफेल डील मामले में जांच की मांग करते हुए याचिका दायर की थी।

राहुल को सावधानी बरतने की जरूरत

वहीं, राहुल गांधी की ओर से राफेल पर सुप्रीम कोर्ट के बयान को गलत तरह से पेश करने के मामले पर बेंच ने कहा कि हम उनकी माफी स्वीकार करते हैं। उन्हें आगे सावधानी बरतने की जरूरत है। दरअसल, कोर्ट राफेल डील के लीक दस्तावेजों को सबूत मानकर मामले की दोबारा सुनवाई के लिए तैयार हो गया था। इस पर राहुल ने कहा था कि कोर्ट ने भी मान लिया है कि चौकीदार ने ही चोरी की है।

भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने राहुल के खिलाफ अवमानना का मामला दर्ज कराया था। राहुल ने जवाब में कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में ‘चौकीदार चोर है’ टिप्पणी नहीं की थी। यह सब चुनाव प्रचार के दौरान गर्म माहौल में उनके मुंह से निकल गया था। 

केंद्र ने गोपनीय दस्तावेजों को सबूत मानने का विरोध किया था

13 मई को केंद्र सरकार ने राफेल से जुड़े दस्तावेज लीक होने के मामले में सुुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया था। इसमें केंद्र ने दलील दी कि राफेल मामले में जिन दस्तावेजों को आधार बनाकर पुनर्विचार याचिका दाखिल की गई है, वे भारतीय सुरक्षा के लिए काफी संवेदनशील हैं। इनके सार्वजनिक होने से देश की सुरक्षा खतरे में पड़ी है। केंद्र ने कहा- याचिकाकर्ता यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी, प्रशांत भूषण संवेदनशील जानकारी लीक करने के दोषी हैं। याचिकाकर्ताओं ने याचिका के साथ जो दस्तावेज लगाए हैं वे प्रसारित हुए हैं, जो अब देश के दुश्मन और विरोधियों के लिए भी मौजूद हैं।

3 साल पहले हुई थी राफेल डील
राफेल फाइटर जेट डील भारत और फ्रांस की सरकारों के बीच सितंबर 2016 में हुई। इसके तहत भारतीय वायुसेना को 36 अत्याधुनिक लड़ाकू विमान मिलेंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह सौदा 7.8 करोड़ यूरो (करीब 58,000 करोड़ रुपए) का है।

एनडीए और यूपीए सरकार के दौरान मूल्य में कितना फर्क?
कांग्रेस का दावा है कि यूपीए सरकार के दौरान एक राफेल फाइटर जेट की कीमत 600 करोड़ रुपए तय की गई थी। मोदी सरकार के दौरान एक राफेल करीब 1600 करोड़ रुपए का पड़ेगा।

राफेल की कीमत में इतना अंतर क्यों?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूपीए सरकार के दौरान सिर्फ विमान खरीदना तय हुआ था। इसके स्पेयर पार्ट्स, हैंगर्स, ट्रेनिंग सिम्युलेटर्स, मिसाइल या हथियार खरीदने का कोई प्रावधान उस मसौदे में शामिल नहीं था। फाइटर जेट्स का मेंटेनेंस बेहद महंगा होता है। मोदी सरकार ने जो डील की है, उसमें इन सभी बातों को शामिल किया गया है। राफेल के साथ मेटिओर और स्कैल्प जैसी दुनिया की सबसे खतरनाक मिसाइलें भी मिलेंगी। मेटिओर 100 किलोमीटर तक मार कर सकती है जबकि स्कैल्प 300 किमी तक सटीक निशाना साध सकती है। कांग्रेस की आपत्ति है कि इस डील में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का प्रावधान नहीं है। पार्टी इसमें एक कंपनी विशेष को फायदा पहुंचाने का आरोप भी लगाती है।

राफेल डील में ऑफसेट क्लॉज क्या है?
यह भी इस समझौते का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। ऑफसेट क्लॉज (एक ऐसी शर्त जो इस करार का हिस्सा है लेकिन इस्तेमाल दूसरी जगह होगा) के मुताबिक, फ्रांस इस करार की कुल राशि का करीब 50% भारत में रक्षा उपकरणों और इससे जुड़ी दूसरी चीजों में निवेश करेगा।

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