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श्रीराम वैसे तो भगवान के अवतार है पर भारत में एक राजनैतिक मुद्दा

बाबरी मस्जिद काण्ड, गोधरा काण्ड और इसी कड़ी में सैकड़ों दंगे, भारत के स्वतंत्र इतिहास में काले धब्बे हैं।

बच्चों को पढ़ाते समय इतिहास के कुछ पन्ने हम जल्दी उलट देते हैं, क्योंकि उन पन्नों की कहानी ऐसे सवाल खड़ा करती हैं जिन्हें सुनकर भी शर्मिंदा होते हैं, और उनके कारण सोचकर भी।

कुछ दिनों में शायद श्रीराम मंदिर और बाबरी मस्जिद काण्ड के संबंध में स्थायी और सुखद निर्णय आने की महीन संभावना है।

फैसला जो भी आए लेकिन भाजपा ने साम्प्रदायिकता की जिस दहकती आग में अपने समर्थकों को झोंका था, उस आग से भाजपा कभी निकल नहीं पाई और न ही अपने समर्थकों को निकाल पाई।

काँग्रेस और बाकी अन्य दलों ने चाहे 370 हो या राम मंदिर, इन मुद्दों को हवा न देते हुए देश के विकास को आगे रखा और 370 में संशोधन करते हुए कमजोर किया और श्रीराम मंदिर के ताले खुलवा कर जनता को दर्शन की इजाजत दी, बल्कि VHP को पूजा कर वहीं से चुनाव प्रचार शुरू करने की अनुमति भी दी।

इसी बीच जनता को सुविधाएं और देश को ताकत देने में योजनाएँ लगाते रहे, लेकिन भाजपा हिंदुत्व के मुद्दे से खुद को अलग नही रख सकी।

इसका असर ये हुआ कि युवा अपनी अपरिपक्व ताकत और गर्म खून की भीड़ में शामिल होकर, देशभक्त न होकर, सिर्फ हिन्दू हो गए।

बाबरी मस्जिद से आडवाणी चमक गए, और इसी आग की लपट में जल गोधरा काण्ड में मोदी चमक गए।

आज जोड़-घटाना करें तो साफ होता है भाजपा ने ही काण्ड किये और इन्हीं काण्ड से नेता बनाए।

लेकिन क्या सिर्फ भाजपा इस साम्प्रदायिक नफरत के लिए जिम्मेदार है?

नहीं… चाहे काँग्रेस हो या बाकी विपक्षी दल, चाहे ओवैसी हों या ममता बनर्जी, मुलायम हों या मायावती सभी ने भाजपा को सांप्रदायिक पार्टी बनने के लिए माहौल दिया।

पर सवाल भाजपा पर ही उठेंगे और जवाब भी उन्हें ही देने होंगे।

आखिर श्रीराम जी का मंदिर जब भाजपा के लिए सबसे पहली जरूरत थी, तो क्यों मोदी बिन दर्शन किए अयोध्या से लौट आए और अटल जी को उनके कार्यकाल में कभी अयोध्या जाने का ख्याल नहीं आया?

ये सवाल आज हर भारतीय को करना है, लेकिन अब शायद देर हो गई है।

कुछ दिनों बाद बाकी कई सवालों की तरह आप ये सवाल भी नहीं कर पाएंगे।

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