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हांथी को एहसास हो गया की वो हांथी है-और वो हार गया- विश्लेषण

विश्वास और अतिविश्वास में बहुत महीन फर्क होता है. और यही अतिविश्वास और अहंकार में भी बारीक फर्क होता है.


वर्तमान में भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह पर ऊपर का विचार सटीक बैठता है. सरकार बनाने के लिए साम दाम दण्ड भेद की राजनीति भाजपा ने अमित शाह की अध्यक्षता में शुरू हुई
बिहार, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश, गोवा, कर्णाटक, हरियाणा से होते हुए यह हॉर्स ट्रेडिंग का फार्मूला महाराष्ट्र तक आ गया.


केद्र और राज्य विधान सभाओं में मिली जीत से अमित शाह के मन में अपनी सफलता का भाव जागृत हो उठा और उनकी एक धारणा कि “वो इस देश में अब सब कुछ कर सकते हैं” स्थाई हो गई, और इसी स्थाई भावना ने उनको महाराष्ट्र में भी वही निति अपनाने पर मजबूर किया.
लेकिन वही बात सामने आ गई की आत्मविश्वास और अतिविश्वास के बीच का फर्क बारीक होता है, जिसे पहचानने में इस बार अमित शाह धोखा खा बैठे.


सुप्रीम कोर्ट ने अरुणाचल प्रदेश और कर्णाटक में फ्लोर टेस्ट के आदेश देकर पहले ही स्पष्ट कर दिया था की जब सरकार सीधे नही चलेगी तो संविधान उन्हें रास्ता दिखाएगा, आज 26 नवम्बर को “संविधान दिवस” पर मान. सर्वोच्चा न्यायलय ने एक बार फिर सरकार की मंशा के विपरीत फैसला सुना कर देश की जनता को सन्देश दिया की कानून इतना भी कोमल नही है की कोई भी हाथ में ले कर खेलने लगे.


कल 27 नवम्बर को शाम 5 तक फ्लोर टेस्ट करने के आदेश दिए गए है, अब फड़नवीस और अजित पवार की नही महाराष्ट्र में अमित शाह की निति का एक और बुरा चेहरा जनता ने देख लिया. सुप्रीम कोर्ट ने न केवल फ्लोर टेस्ट कराने बल्कि ऑन एयर (लाइव) करने साथ ही खुले वोट पर (मतलब गुप्त मतदान नही) करने के आदेश दिए.


सीधा सा सन्देश है इस फैसले में की कोर्ट भी समझ रही है की जनता के साथ पूरी व्यवस्था की आँखों में धुल झोंकी जा रही है…और फिर दुबारा भी झोंकी जा सकती है.


लेकिन यहाँ अभी एक और ट्विस्ट बाकि है की कुछ लोग ये समझ रहे हैं की प्रोटेम स्पीकर यदि भाजपा के मन का बन जाता है तो वो अजित पवार को विधायक दल का नेता मानकर उनसे व्हिप जारी करवा कर भाजपा के समर्थन पर वोट करने के लिए कहलवा सकते हैं, अगर विधायक ऐसा नही करेंगे तो वो वोट करने का अधिकार खो देगे.


लेकिन पेंच ये है की जब अजित पवार ने समर्थन पत्र भाजपा को सौंपा था उस समय वो विधायक दल के नेता थे, लेकिन वर्तमान में वो अपना वो पद गवां चुके हैं, मतलब वर्तमान में वो न तो व्हिप जारी करके की पात्रता रखते हैं, न ही समर्थन पत्र देने की.


मतलब ये है की अब या तो शिवसेना का मुख्यमंत्री बनेगा या फिर भाजपा का कोई बड़ा कारनामा महाराष्ट्र की जमीन पर देखने मिलेगा.


सरकार तो भाजपा की किसी सूरत में बनती नही दिख रही.

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