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चाबहार पोर्ट आर्थिक एवं सामरिक दोनों दृष्टि से भारत के लिए महत्वपूर्ण, जानें- क्या पड़ेगा इसका असर.

Chabahar Port Agreement ईरान और चीन के बीच 400 बिलियन डॉलर की महत्वाकांक्षी डील पर पूरी दुनिया की नजर टिकी है। दोनों देशों के बीच हुआ यह रणनीतिक और व्यापारिक समझौता अगले 25 वर्षों तक मान्य होगा। इस समझौते के बाद पिछले सप्ताह ईरान ने घोषणा की थी कि चाबहार रेल प्रोजेक्ट से भारत को अलग कर दिया गया है, लेकिन बाद में ईरान ने इसका खंडन किया। वैसे इस संदर्भ में ईरान के बयान बदलते रहे हैं। पहले ईरान ने कहा कि वह इस प्रोजेक्ट को स्वयं ही पूरा करेगा। बाद में कहा कि भारत के साथ इस प्रोजेक्ट को लेकर कोई समझौता ही नहीं हुआ है। अब कहा है कि इस प्रोजेक्ट में भारत पूर्ववत ही शामिल है। इसके बाद ईरान ने गैस फील्ड फरजाद बी ब्लॉक से भी भारत को बाहर कर दिया।

भारत चाबहार-जाहेदान प्रोजेक्ट का हिस्सा: स्पष्ट है चीनी डील का भारत पर प्रभाव पड़ने लगा है। ईरान और भारत के बीच चार वर्ष पूर्व चाबहार से अफगानिस्तान की सीमा पर जाहेदान तक रेल लाइन बिछाने को लेकर समझौता हुआ था। पहले ईरान ने इस प्रोजेक्ट को स्वयं ही पूरा करने की बात कही थी, परंतु अब भारत द्वारा उपरोक्त प्रोजेक्ट को शीघ्र पूरा करने के आश्वासन के बाद ईरान ने अपना रुख फिर बदला है। ईरान के ट्रांसपोर्ट और रेलवे विभाग के उपमंत्री सईद रसौली ने कहा है कि भारत चाबहार-जाहेदान प्रोजेक्ट का हिस्सा है तथा पूर्व की खबरों को साजिश का हिस्सा बताया। भारत के लिए यह प्रोजेक्ट अत्यंत ही महत्वपूर्ण है।

प्रोजेक्ट को लेकर ईरान के बयान क्यों बदलते रहते हैं?: प्रश्न उठता है कि इस प्रोजेक्ट को लेकर ईरान के बयान क्यों बदलते रहते हैं? चाबहार-जाहेदान रेलमार्ग की लंबाई 628 किमी है। ईरान में 2021 में चुनाव हैं। इसलिए ईरान चाहता है कि प्रारंभिक 150 किमी रेलखंड को मार्च 2021 तक पूरा कर लिया जाए, जबकि शेष भाग मार्च 2022 तक। प्रश्न उठता है कि इस प्रोजेक्ट में भारत की ओर से देर क्यों हो रहा है? ईरान के इस प्रोजेक्ट का काम –खातम-अल-अनबिया कंस्ट्रक्शन कंपनी- से कराना चाहता है, जबकि भारत को ईरान की आइआरजीसी यानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की इस कंपनी के प्रोजेक्ट में शामिल होने से दिक्कत है। इसकी वजह यह है कि अमेरिका ने आइआरजीसी पर प्रतिबंध लगा रखा है।

लिहाजा भारत आइआरजीसी की कंपनियों को इस प्रोजेक्ट से दूर रखना चाहता है ताकि यह प्रोजेक्ट अमेरिकी प्रतिबंधों से दूर रहे। लेकिन फरजाद बी ब्लॉक मामले में ईरानी रुख में कोई बदलाव नहीं आया है। पहले इस प्रोजेक्ट में भारतीय कंपनी ओएनजीसी शामिल थी, लेकिन अब ईरान का कहना है कि वह इस प्रोजेक्ट को अकेले पूरा करेगा। भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी ईरान के इस कदम की पुष्टि की है। भारत वर्ष 2009 से ही इस गैस फील्ड का ठेका पाने के लिए कोशिश कर रहा था।

चीन ने ईरान के साथ महामारी के दौरान गोपनीय डील की है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस गोपनीय समझौता के 18 पेज को सार्वजनिक किया है। इसके अनुसार 400 बिलियन डॉलर के डील के द्वारा ईरान चीन को अगले 25 वर्षों तक बेहद सस्ती दरों पर कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस देगा और बदले में चीन ईरान में बड़े स्तर पर निवेश करेगा। यह भारत के लिए भी चिंता का विषय है।

चाबहार का भारत के लिए महत्व : सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण ईरान के दक्षिण पूर्व तट पर स्थित चाबहार बंदरगाह का विकास भारत द्वारा किया जा रहा है। भारत-ईरान- अफगानिस्तान इस पोर्ट के जरिये ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर बनाने के लिए त्रिपक्षीय समझौता कर चुके हैं। वर्ष 1947 में देश के विभाजन के बाद संपूर्ण मध्यपूर्व, मध्य एशिया और यूरोप से भारत भौगोलिक तौर पर दूर हो गया जिसे पाटने में चाबहार की महत्वपूर्ण भूमिका है। चाबहार द्वारा समुद्री रास्ते से होते हुए भारत ईरान में दाखिल हो जाएगा और इसके जरिये अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक के बाजार भारतीय कंपनियों और कारोबारियों के लिए खुल जाएंगे।

पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के कारण चाबहार पोर्ट भारत के लिए बेहद अहम है। यह ग्वादर पोर्ट से केवल 72 किमी की दूरी पर है। इस तरह चाबहार पोर्ट आर्थिक एवं सामरिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है। भारत की भूराजनीतिक स्थिति अत्यंत विशिष्ट है। भारत -महान एशियाई वृत्त चाप के केंद्र- में स्थित है जहां से समूचे एशिया की राजनीति को संचालित और प्रभावित किया जा सकता है। हिंद महासागर में भारत सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से लाभप्रद स्थिति में है, पर भूमिबद्ध मध्य एशिया और पूर्व एशिया से भारत का संपर्क चीन और पाकिस्तान के घेराबंदी के कारण प्रायः अवरुद्ध ही रहा है। भारत की -कनेक्ट सेंट्रल एशिया नीति- इसी स्थिति से उबरने की नीति है जो चाबहार पर ही निर्भर है। ऐसे में भारत के लिए चाबहार के महत्व को समझा जा सकता है।

चाबहार से ईरान के मौजूदा रोड नेटवर्क को अफगानिस्तान में जरांज तक जोड़ा जा सकता है। चाबहार-जाहेदान रेल मार्ग से भारत अफगानिस्तान के निकट तक पहुंच जाएगा। वहीं भारत पहले ही ईरान-अफगानिस्तान सीमा पर जरांज से डेलाराम की 218 किमी लंबी सड़क को आतंकी साए में बना चुका है। भारत द्वारा निर्मित जरांज-डेलाराम रोड के जरिये अफगानिस्तान के -गारलैंड हाईवे- तक आवागमन आसान हो जाएगा। उस हाईवे से अफगानिस्तान के चार बड़े शहरों हेरात, कंधार, काबुल और मजार-ए-शरीफ तक सड़क के जरिये पहुंचना संभव होगा।

अमेरिकी प्रतिबंध और चाबहार प्रोजेक्ट : हालांकि भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों से चाबहार प्रोजेक्ट एवं चाबहार-जाहेदान रेल प्रोजेक्ट को बाहर रखवाया है। इसके बावजूद पिछले चार वर्षों में चाबहार-जाहेदान रेलमार्ग का कार्य रुका रहा। वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री मोदी के ईरान यात्रा के समय चाबहार तथा इस रेलमार्ग पर भारत और ईरान में समझौता हुआ था। भारत की ओर से इंडियन रेलवे कंस्ट्रक्शन लिमिटेड यानी इरकॉन को इस रेल ट्रैक का कार्य करना था। इरकॉन के इंजीनियर कई बार साइट पर गए और ईरानी रेलवे ने तैयारी भी कर ली थी, लेकिन भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों का हवाला देकर काम शुरू नहीं किया। ऐसे में ईरान ने भारत से पहले इस प्रोजेक्ट को लेने की घोषणा की तथा बाद में पुनः भारत को दे दिया।

अमेरिका और चीन के कारण संकट : भारत जल्द ही ईरान के लिए गंभीर नहीं हुआ तो चाबहार का संपूर्ण प्रोजेक्ट भी भारत से निकलकर चीन के हाथ में जा सकता है। बीजिंग खाड़ी देशों में जहां अमेरिका विरोधी ईरान से घनिष्ट संबंध बना रहा है, वहीं अमेरिका के परंपरागत मित्र सऊदी अरब एवं संयुक्त अरब अमीरात के साथ भी लगातार वार्ता कर रहा है। इस बीच चीन भी इस क्षेत्र में अमेरिका एवं रूस की तरह मजबूत उपस्थिति दर्ज कराना चाहता है। सऊदी अरब द्वारा वह रणनीतिक तेल भंडार का सृजन करना चाहता है, वहीं यूएई के द्वारा वह इस क्षेत्र में अपने प्रभाव में वृद्धि करना चाहता है।

बीजिंग इस क्षेत्र में केवल परिवहन और व्यापार हब तक सीमित नहीं रहना चाहता है, बल्कि वह यहां पूर्व और पश्चिम को जोड़ना चाहता है। यूएई की सरकारी संचार कंपनियों ने 5जी नेटवर्क के लिए चीनी कंपनी हुआवे के साथ समझौता किया है। इस तरह चीन खाड़ी क्षेत्र में -अमेरिका समर्थक देश- एवं -अमेरिका विरोधी देश-दोनों से घनिष्ट संबंध रख रहा है। भारत को कूटनीतिक दृष्टि से स्वतंत्र विदेश नीति को स्वीकार करते हुए अमेरिकी दबावों से बाहर आना होगा। चीन-ईरान के प्रस्तावित समझौते के एक अनुच्छेद के मुताबिक चीन को ईरान की हर रुकी या अधूरी पड़ी परियोजनाओं को दोबारा शुरू करने का प्रथम अधिकार होगा। यदि चीन इस विकल्प को चुनता है तो चाबहार बंदरगाह का प्रभावी नियंत्रण अपने हाथ में ले सकता है।

भारत-ईरान संबंधों में शिथिलता का कारण: भारत अपनी आवश्यकता का 80 प्रतिशत से भी अधिक तेल आयात करता है। भारत के लिए कच्चा तेल आयात में समस्या तब उत्पन्न हो गई, जब वर्ष 2018 में अमेरिका एकपक्षीय रूप से ईरान से वर्ष 2015 के न्यूक्लियर डील से बाहर हो गया। अप्रैल 2019 में ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया कि भारत ईरान से तेल नहीं खरीदे और भारत ने एक मई 2019 से ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया। ईरान से तेल आयात करने वाले देशों में भारत, चीन के बाद दूसरे स्थान पर था। ईरान भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर से कम से कम 25 प्रतिशत कम दर पर तेल दे रहा था। इसके अतिरिक्त वह एशियाई प्रीमियम चार्ज भी नहीं लगा रहा था।

भारत ने ईरानी तेल के स्थान पर अमेरिका और सऊदी अरब पर अपनी निर्भरता बढ़ाई। पिछले दो वर्षों में भारत ने अमेरिका से तेल आयात में दस गुना वृद्धि कर दी। भारत दो साल पहले तक अमेरिका से रोजाना 25,000 बैरल प्रतिदिन तेल का आयात करता था, जो अब ढाई लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच गया है। इस तरह भारत महज दो वर्षों में अमेरिकी कच्चे तेल का बड़ा खरीदार बन चुका है। हाल के वर्षों में अमेरिका अचानक से तेल आयातक से तेल निर्यातक देश में परिवर्तित हुआ है। ईरान पर प्रतिबंध लगाकर अमेरिका ने तेल बेचने की नई रणनीति बनाई जिसमें भारत पर भी अमेरिकी तेल खरीदने का दबाव बनाया गया। ईरानी तेल गुणवत्ता की दृष्टि से दुनिया में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

अमेरिकी तेल महंगा होने के साथ गुणवत्ता में पीछे भी ईरान के तेल से कमतर है। भारत केवल संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को ही महत्व देता था, लेकिन अब अमेरिकी प्रतिबंधों को महत्व देने तथा ईरान से तेल नहीं लेने के कारण ईरान भारत से स्वाभाविक रूप से नाराज हुआ। अमेरिकी प्रतिबंधों तथा कोविड-19 के कारण ईरान आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। ऐसे में चीन के साथ 400 बिलियन डॉलर के 25 वर्षीय डील से ईरान को काफी आशाएं हैं, जिससे चीन वहां सैकड़ों विकास परियोजनाओं में निवेश करेगा तथा ईरान के वित्तीय एवं आधारभूत संरचनाओं की स्थिति मजबूत हो सकेगी। चीन चाबहार प्रोजेक्ट पर भी गिद्ध दृष्टि डाले हुए है। इसी कारण चीन के मेगा डील में चाबहार पोर्ट भी शामिल है।

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Written by Bhanu Pratap

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