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क्या है गुरुकुल से लेकर कुशल भारत तक का सफ़र

शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मानव को विकास की ओर ले जाना है। शिक्षा मानव को एक अच्छा इन्सान बनाती है और जीवन का सही मार्ग दिखाती है। शिक्षा में, उचित आचरण और तकनीकी दक्षता, शिक्षण और विद्या प्राप्ति शामिल हैं। जैसे जैसे वक्त बीतता गया भारत की शिक्षा प्रणाली भी वक्त के साथ बदलती गई। प्राचीन कालीन शिक्षा प्रणाली व आज की आधुनिक शिक्षा प्रणाली में जमींन-आसमान का फर्क आ गया है। लेकिन अब भारत को आधुनिक शिक्षा प्रणाली में प्राचीन शिक्षा प्रणाली को शामिल करने की आवश्यकता है। आइये जानते है कि भारतीय शिक्षा प्रणाली में अब तक क्या बदलाव आये है और भारत को कुशल भारत योजना अपनाने की आवश्यकता क्यों है?

प्राचीन शिक्षा प्रणाली

प्राचीन समय में शिष्य गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। यज्ञ और संस्कारों द्वारा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य बालक को 6, 8 अथवा 11 वर्ष की अवस्थाओं में गुरुकुलों में ले जाए जाते थे और गुरु के पास बैठकर ब्रह्मचारी के रूप में शिक्षा प्राप्त करते थे। गुरु उनके मानस और बौद्धिक संस्कारों को पूर्ण करता हुआ उन्हें सभी शास्त्रों एवं उपयोगी विद्याओं की शिक्षा देता था। 

राम ने ऋषि वशिष्ठ के यहाँ रह कर शिक्षा प्राप्त की थी। इसी प्रकार पाण्डवों ने ऋषि द्रोण के यहाँ रह कर शिक्षा प्राप्त की थी।

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प्राचीन भारत के गुरूकुलों के अंतर्गत तीन प्रकार की शिक्षा संस्थाएँ थीं-

(1) गुरुकुल- जहाँ विद्यार्थी आश्रम में गुरु के साथ रहकर विद्याध्ययन करते थे।

(2) परिषद- जहाँ विशेषज्ञों द्वारा शिक्षा दी जाती थी।

(3) तपस्थली- जहाँ बड़े-बड़े सम्मेलन होते थे और सभाओं तथा प्रवचनों से ज्ञान अर्जन होता     था। नैमिषारण्य ऐसा ही एक स्थान था।

वाराणसी अत्यंत प्राचीन काल से शिक्षा का मुख्य केंद्र थी और अभी हाल तक उसमें सैकड़ों गुरुकुल, पाठशालाएँ रही हैं और उनके भरण पोषण के लिए अन्नक्षेत्र चलते रहे। यही अवस्था बंगाल, नासिक तथा दक्षिण भारत के अनेक नगरों में रही।

प्राचीन काल में, गुरु अपने शिष्यों की कौशल विद्या पर ज्यादा ध्यान देते थे। उस वक्त शिष्यों को सैद्धांतिक ज्ञान (थ्योरेटिकल नॉलेज) के साथ-साथ कौशल विद्या (स्किल लर्निंग) भी अर्जित करना महत्वपूर्ण मन जाता था। तब ‘गुरु-शिष्य परम्परा’ बहुत विख्यात थी।

अंग्रेजो ने बदली थी भारत की शिक्षा प्रणाली

अंग्रेजों के आगमन ने सीखने की एक नई जगह यानी मिशनरी का निर्माण किया। ताकि, वे “रक्त और रंग में भारतीय, लेकिन स्वाद में अंग्रेजी” के रूप में भारतीय का एक वर्ग बना सकें, जो सरकार और जनता के बीच दुभाषियों के रूप में काम करेंगे।

चार्ल्स ग्रांट और विलियम विल्बरफोर्स, जो मिशनरी कार्यकर्ता थे, ने ईस्ट इंडिया कंपनी को पश्चिमी साहित्य पढ़ाने और ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए अपनी गैर-आविष्कार नीति को छोड़ने और अंग्रेजी के माध्यम से शिक्षा के प्रसार के लिए रास्ता बनाने के लिए मजबूर किया था।

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Scene from a Shaker School in 19th Century USA, engraving from The Communistic Societies of the United States, by Charles Nordoff, 1875

अंग्रेजो द्वारा भारतीयों को शिक्षा प्रदान करने के पीछे कई कारण थे। अंग्रेज चाहते थे कि भारतीयों को ऐसी शिक्षा दी जाये कि उस शिक्षा को प्राप्त कर भारतीय लोग अंग्रेजों के अंडर रहकर अंग्रेजो का ही काम कर पाए। अंग्रेजो ने ही प्राथमिक (प्राइमरी) और माध्यमिक (सेकेंडरी) शिक्षा की शुरुआत की थी और उन्होंने ही कॉलेज की पढ़ाई की प्रणाली आरम्भ की थी।

इस नई शिक्षा प्रणाली के चलते लोगो के पास सैद्धांतिक ज्ञान (थ्योरेटिकल नॉलेज) होना जरूरी मन जाने लगा। तब ही से हार्ट के लोगो का शयन कौशल विद्या (स्किल लर्निंग) से हटकर सिर्फ सैद्धांतिक ज्ञान तक सिमटकर रह गया।

आधुनिक शिक्षा प्रणाली

अब हमारा देश आधुनिक भारत बन गया है जहा शिक्षा भी शिक्षा भी आधुनिक तौर-तरीको से दी जाने लगी है। फ़िलहाल भारत में कॉलेज और स्कूल की संख्या करोड़ो में है। जहा विद्यार्थियो की नियमित कक्षा (क्लासेज) लगती है और उन्हें चिकित्सा, राजनीतिक, इतिहास, प्रौद्योगिकी (टेक्नोलॉजी) व गणित का ज्ञान महान विद्वानो द्वारा दिया जाता है। यही ज्ञान अर्जित करके भारत और भरत के लोग विकास की और बढ़ रहे है।

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मगर देखा जाये तो भारत में अब भी ऐसे कई लोग है जो थ्योरेटिकल नॉलेज प्राप्त कर डिग्रीयां अपने हाथो में लेकर नौकरी की तलाश में घूम रहे है। भारत में बेरोजगार लोगो की संख्या ज्यादा होने के पीछे एक यह भी महत्वपूर्ण कर्ण है कि भारत के नागरिको के पास किताबी ज्ञान तो बहुत है मगर उस ज्ञान को वास्तविक जीवन में उतरने और इस्तेमाल करने के लिये जिस  कौशल विद्या की मदद लगती है वह नही है।

कुशल भारत योजना (स्किल्ड इंडिया स्कीम)

हमारे देश के प्रधानमंत्री “श्री नरेंद्र मोदी जी” ने सन 2014 में सत्ता में आते ही बहुत सी योजनाओं को शुरू किया जैसे “डिजिटल इंडिया”, “मेक इन इंडिया” जिसका लक्ष्य देश को विकास की ओर ले जाना है जिससे देश विकास की ओर दूसरे देशों से पीछे न रहे। इसलिए उन्होंने एक और योजना “कौशल भारत” योजना की शुरुआत की। इस योजना का मुख्य उद्देश्य भारतीय युवाओं के कौशल के विकास के लिए अवसर, स्थान और स्कोप बनाना है एवं उन क्षेत्रों में जहाँ कई सालों से विकास नहीं हुआ है उसे अधिक विकसित करना और साथ ही कौशल विकास के लिए नए क्षेत्रों की पहचान करना है। इस योजना का लक्ष्य सन 2022 तक भारत के लगभग 40 करोड़ युवाओं को उनके कौशल विकास के लिए प्रशिक्षित कराना है।

अगर देश के नागरिको के पास सैद्धांतिक ज्ञान (थ्योरेटिकल नॉलेज) के साथ कौशल विद्या (स्किल लर्निंग) भी होगा तो इससे भारत देश को जल्द ही ओर नई ऊचाई हाशिल होगी और देश की जनता की जीवनशैली भी काफी सकारात्मक बदलाव आयेगे।

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Written by Pooja Patidar

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