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9 साल में 32 सैन्यकर्मी और बीएसएफ के जवान पाकिस्तान के लिए जासूसी करते पकड़े गए

  • 2019 में सर्वाधिक 13 जवान पकड़े गए, पाकिस्तान को परमाणु पनडुब्बी और मिसाइल की संवेदनशील जानकारियां तक भेजीं
  • रिटा. ब्रिगेडियर रवींद्र कुमार के मुताबिक- रिक्रूटमेंट के समय से ही दुश्मन की नजर जवानों पर रहती है, कुछ पहले से ही आतंकियों के संपर्क में होते हैं

हाल ही में देश तब सकते में आ गया, जब जम्मू-कश्मीर पुलिस का डीएसपी देविंदर सिंह आतंकियों के साथ पकड़ा गया। उसके पुलवामा हमले तक में शामिल होने की बता कही जा रही है। भास्कर ने देविंदर जैसे अन्य वर्दीधारी गद्दारों की पड़ताल की, तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं। 9 साल में 32 सैन्यकर्मी और बीएसएफ के जवान पाकिस्तान के लिए जासूसी करते पकड़े गए या पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के हनी ट्रैप में फंसे। इनमें से ज्यादातर मामले में ये जवान स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के चक्कर में हनी ट्रैप में फंसे हैं।

 
जासूसी के आरोप में पकड़े गए इन सर्विस पर्सनल में 15 आर्मी के, 7 नेवी के और 2 एयरफोर्स के हैं। इनके अलावा डीआरडीओ की नागपुर स्थित ब्रह्मोस मिसाइल यूनिट का इंजीनियर, सिविल डिफेंस का एक, बीएसएफ के 4 जवान और 3 एक्स सर्विसमैन शामिल हैं। इस बात पर चिंता जाहिर करते हुए सेना के रिटायर्ड ब्रिगेडियर रवींद्र कुमार बताते हैं कि रिक्रूटमेंट के समय से ही दुश्मनों की नजर जवानों पर रहती है।

सेना से ज्यादा गद्दार

कुछ लोग पहले से आतंकियों व आईएसआई के संपर्क में होते हैं। ये सेना में भर्ती हो जाते हैं, जिनका पता नहीं चलता। अब ज्यादातर लोग हनी ट्रैप के जरिए निशाना बनाए जाते हैं। पुलिस और पैरामिलिट्री फोर्स की बजाय सेना ही उनके टारगेट पर होती है, इसलिए ज्यादा गद्दार सेना से निकलते हैं।

 
ब्रिगेडियर रवींद्र कहते हैं कि कश्मीर व नक्सल प्रभावित जगहों पर पुलिस पर लोकल राजनीति का असर ज्यादा होता है और वे ही पैरामिलिट्री फोर्स में डेपुटेशन पर आते हैं। लेकिन आईएसआई के हनी ट्रैप में नादान सैनिक आसानी से फंस जाते हैं। हालांकि 15 लाख की फौज में गद्दारों की यह संख्या समुद्र में बूंद के समान है।

‘‘लेकिन जिस तरह एक मछली पूरे तालाब को गंदा करती है, जहर की एक बूंद भी आदमी को मार देती है। फौजी अदालतें इसलिए ही सख्त मानी जाती है। वहां ऐसे अपराधों में 100% सजा मिलती है, सिविल कोर्ट की तरह कानूनी पैंतरे ज्यादा नहीं चल पाते।’’
 

9 साल में किस फोर्स/संस्थान से कितने जासूस पकड़े

  • 15- थल सेना से पकड़े गए
  • 7- नौसेना में गिरफ्तार किए
  • 2- वायु सेना में पकड़े गए
  • 8- डीआरडीओ, बीएसएफ व अन्य 

मिसाइल स्ट्रैटजी से लेकर युद्धाभ्यास तक सुरक्षित नहीं

  • एक महीने पहले ही पूर्व नौसेना कमान के 7 नेवी सेलर्स और एक हवाला कारोबारी को गिरफ्तार किया। इनमें से विशाखापट्‌टनम के 3 नेवी सेलर्स राजेश, निरंजन और लोकानंद फेसबुक पर दो युवतियों की फेक आईडी पर परमाणु पनडुब्बी अरिहंत की सूचनाएं दे रहे थे। मुंबई व करवर में पकड़े गए 4 नेवी सेलर्स एयरक्राफ्ट कैरियर विक्रमादित्य की सूचनाएं दे रहे थे।
  • एक साल पहले डीआरडीओ की नागपुर स्थित ब्रह्मोस मिसाइल युनिट का इंजीनियर निशांत अग्रवाल भी हनी ट्रैप हो गया। उसे कनाडा में 30 हजार यूएस डॉलर की नौकरी का भी लालच दिया था। उसने तो मिसाइल स्ट्रैटजी लीक करना शुरू कर दिया था। वह दो युवतियों की फेक आईडी पर क्लासिफाइड इन्फॉर्मेशन दे रहा था।
  • पिछले साल हरियाणा में कुमाऊ रेजिमेंट का रवींद्र कुमार, महू-एमपी में 10 बिहार रेजिमेंट का नायक अविनाश कुमार, जैसलमेर की टैंक रेजिमेंट का सोमवीर, पोकरण में तैनात लांस नायक रवि वर्मा व सिपाही विचित्र बोहरा और कश्मीर में पोस्टिंग कर रहे मल्कियतसिंह भी हनीट्रैप में फंसे। इनसे आईएसआई युद्धाभ्यास, सेना की जानकारियां ले रही थी।

सैन्य अदालतें 80% मामलों में दोषी ठहराती हैं
2010 से 18 तक पकड़े गए देश के गद्दारों में से 12 दोषियों को सजा हो चुकी है। बचे हुए 16 दोषी सेवा से बर्खास्त हो चुके हैं, वे जेलों में है। उनके केस अंडर ट्रायल है। ऐसे मामलों में सैन्य अदालतों की कन्वीक्शन रेट 100% है, जबकि औसत 80% इसलिए रहता है, क्योंकि छोटे-मोटे अपराध व एक्सीडेंट जैसे केस में ये बरी हो जाते हैं।

सोशल मीडिया बड़ा खतरा, इससे बढ़ रहे हनी ट्रैप केस

20 लाख सैनिकों वाली फोर्स में 32 मामले। ये कुछ मामले असामान्य हैं और इन्हें ऐसे ही लिया जाना चाहिए। हर सिस्टम को ऐसे संदेहास्पद मामलों पर लगाम रखने के लिए अपना तरीका ईजाद करना चाहिए और ऐसा हो भी रहा है। ज्यादातर केस फोर्स द्वारा ही सामने लाए गए हैं। फिर चाहे वह हनी ट्रैप हो या पैसों के लालच में। इन सभी के लिए गाइडलाइन बनाई गई है और उन पर लगातार नजर रखी जा रही है। ऐसे मामलों की संख्या काफी कम है। सोशल मीडिया के चलते हनी ट्रैप आसान है लेकिन अलर्ट काउंटर चेक उन्हें नाकामयाब कर रहा है। ऐसा न हो इसके लिए कुछ हिदायतें हैं। सेना के दफ्तरों में स्मार्टफोन बैन हैं, ऑफिस के कम्प्यूटर्स के यूएसबी पोर्ट डिसेबल रहते हैं, पेन ड्राइव लाने पर मनाही है और सोशल मीडिया एंगेजमेंट्स पर रोक है। यही नहीं सेना लगातार अपने जवानों और अफसरों को ऐसे जाल में फंसने को लेकर अवेयरनेस कैम्पेन भी चलाती है।ले. जनरल सतीश दुआ (रिटायर्ड), पूर्व चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ

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