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मध्यमवर्गीय परिवार मध्य के ही होकर रह गए

जिस तरह बड़े बेटे को घर में सम्मान और छोटे को सभी का स्नेह मिलता है, परंतु मझला बेटा उसके हिस्से में आने वाले सम्मान और स्नेह दोनो से ही कहीं न कही वंचित रह जाता है। ठीक वही परिस्थिति कोरोना महामारी के चलते लगाए गए लॉक डाउन ने मध्यमवर्गीय परिवारों की कर दी हैं।

भारत की अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने में मध्यमवर्गीय परिवार एक आधार स्तम्भ हैं। यह देश की वह स्वाभिमानी सामाजिक इकाई है जो संस्कृति के संरक्षण के साथ-साथ दुनियाँ के साथ कदम मिला कर चलने का जिम्मा अपने सर पर ले कर चलती है। बच्चों को अच्छी शिक्षा प्रदान करना,  घर बनाना, बच्चों की शादी करना ही एक सामान्य मध्यम वर्गीय परिवार के प्रधान का जीवन भर का स्वप्न होता है,  इसके लिए बैंक से लिए गए लोन की किश्त भरते भरते ही जीवन का अंतिम दौर आ जाता है।

यह समाज का वह तबका है, जिसे सरकार द्वारा बनाए कानून एवं नियमों का पालन सर्वप्रथम करना होता है, सारे टैक्स समय पर भरने होते हैं, साथ ही देश पर आने वाली हर आपदा से निपटने में समाज की यह इकाई बढ़चढ़ कर भाग भी लेती हैं। कोरोना महामारी से बचाव के लिए किए गए लॉक डाउन लगभग डेढ़ महीने का होने वाला है, इसमे कोई दो मत की बात नही कि इतने लंबे लॉक डाउन ने समाज के हर वर्ग को प्रभावित किया हैं,  परंतु अगर हम पूंजीपति वर्ग की बात करें जो भारत की कुल जनसंख्या का मात्र एक प्रतिशत है, उसको लॉक डाउन का इतना फर्क नही पड़ेगा।

दूसरी और गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाली जनता है, उनकी भी परिस्थिति बहुत दयनीय है परंतु उनकी सहायता करने के लिए सरकार एवं दूसरी सामाजिक संस्थाए आगे आ रही हैं, जो एक सराहनीय कदम है परंतु किसी का भी ध्यान मध्यम वर्गीय परिवारों पर नही गया। इस लॉक डाउन ने  मध्यम वर्ग की तो कमर तोड़ कर रख दी हैं। लॉक डाउन के कारण इन परिवारों ने प्रारम्भ में तो होंसला बनाए रखा और घर मे संग्रहित किए कुछ राशन एवं जमा पूंजी से न केवल अपना काम चलाया परन्तु अपने आस पास के जरूरतमन्दों की सहायता करने में एक क्षण की भी देर नहीं की परंतु अब ना ही उनके पास इतने राशन का भंडारण है,और ना ही किसी प्रकार की आर्थीक सहायता।

स्वाभिमान के कारण किसी से मांगने की हिम्मत भी नहीं। दूसरी ओर चिंता उन बिल एवं लोन की किश्तों की है जिनका उनकी आमदानी बंद हो जाने पर कोई फर्क नही पड़ा है। यह सारी चिंताए उसके आत्मसम्मान को धीरे धीरे दीमक की तरह हर दिन खोखला कर रही हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार ऐसे जरूरतमंद मध्यम वर्गीय परिवारों की ओर भी अपना ध्यान आकर्षित करे, उन्हें भी आर्थिक सहायता पहुँचाए अन्यथा इस लॉक डाउन के अंत तक कई मध्यम वर्गीय परिवार गरीबी रेखा के नीचे पहुँच जाएंगे।

साथ ही सामाजिक संस्थाएँ एवं सक्षम परिवारों को भी सहायता करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कहीं उनके आसपास ही कोई ऐसा परिवार तो नही जो लॉक डाउन की आर्थिक मार को झेल रहा है परंतु समाज में उसकी छवि धूमिल न हो जाए उस शर्म से किसी से मदद की गुहार भी नही कर पा रहा है। यह समय वह समय है जब हम सभी मिलकर केवल अपने स्वार्थ की रोटी ना सेंक कर एक दूसरे का साथ देते हुए वसुधैव कुटुंबकम को पूर्ण रुप से यथार्त करे।

आर्थीक सहायता के साथ इन स्वावलंबी परिवारों को मानसिक सहायता की भी उतनी ही आवश्यकता है। आवश्यकता है हौसलें एवं आश्वासन की,  कि उन्हें अपने जीवन की गाड़ी को फिर से पटरी पर लाने के लिए समय एवं पर्याप्त सहयोग भी दिया जाएगा।

समाज का यह वर्ग कभी भी कुछ विशेष मांग नही रखता। बस जीवन यापन के लिए आवश्यक सामघ्री इन्हें सहसम्मान प्राप्त हो जाए तो ये परिवार खुशी से सुरक्षित एवं नियमबद्ध हो कर सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने में समर्थ रहेंगे।

लेखक – सत्यनारायण शर्मा ( पत्रकार) – बामनिया, झाबुआ

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Written by Aviral Jain

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