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प्रसून जोशी ने गीत से बयां किया बेटियों का दर्द; मोहे लोहार के घर दे दीजो…जो मोरी जंजीरें पिघलाए

  • दैनिक भास्कर की 23वीं वर्षगांठ पर हो रहे आयोजन में पहुंचे गीतकार प्रसून जोशी 
  • महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा और दुष्कर्म को लेकर कविताओं से बयां किया दर्द  

यहां दैनिक भास्कर की 23वीं वर्षगांठ पर आयोजित भास्कर उत्सव में गीतकार प्रसून जोशी पहुंचे। उन्होंने महिलाओं के साथ हो रही हिंसा पर अपनी पीड़ा गीत के माध्यम से व्यक्त की। दरअसल, जब कार्यक्रम के दौरान प्रसून से पूछा गया कि निर्भया को आज तक किसी ने नहीं देखा, उसे आप कैसे श्रद्धांजलि देंगे?

इसके जवाब में प्रसून ने कहा कि निर्भया को किसी ने नहीं देखा। उससे कोई रिश्ता भी नहीं था। बावजूद इसके घटना के बाद लोग सड़कों पर थे। पूरे देश में एक उबाल था। फिर हैदराबाद की डॉक्टर थी। सड़क किनारे जली हुई लाश में तब्दील। एक बार फिर गुस्सा भड़का। ऐसे तमाम घटनाएं रोज हमारे सामने से होकर और न्यूज चैनल व अखबारों की सुर्खियां बनती हैं। जब-जब ऐसा कुछ होता है, घटना होती है, हम सबको झकझोर देती है। तब एक प्रश्न तो उठता ही है। 

अब कोख में टार्च लेकर उतर चुके है वे लोग। 
बीज में किसी की सहमी बैठी है किसी की संतान।
वाह रे सभ्यता वाह रे इनसान।
बाबुल जिया मोरा घबराए।


बाबुल जिया मोरा घबराए
बाबुल मोरी इतनी अरज सुन ली जो। 
मोहे सुनार के घर ना दीजो।
मोहे सुनार के घर ना दीजो।
मोहे जेवर कभी ना भाए।
मोहे राजा घर ना दीजो।

मोहे राजा घर ना दीजो।
मोहे राज ना करना आए।
बाबुल जिया मोरा घबराए।
बाबुल जिया मोरा घबराए।


बाबुल मोरी इतनी अरज सुन लीजो।
मोहे लोहार के घर दे दीजो।
जो मोरी जंजीरें पिघलाए।
बाबुल जिया मोरा घबराए।

बस, इतना ही तो चाहती हैं लड़कियां
( प्रसून जोशी ने इसे गाकर सुनाया।)


लड़की का लड़की होने पर ही सम्मान करें
प्रसून जोशी ने कहा, लड़की को समाज में लड़कों के अधिकार नहीं चाहिए, लेकिन उसको उसके होने का सम्मान चाहिए। वह कुछ असाधारण हो तभी उसी का सम्मान करें इससे अच्छा है कि उसके लड़की होने पर भी सम्मान करें। ओलंपिक में बेटियों के मेडल जीतने पर भी बात आई। इस पर प्रसून जोशी ने एक कविता सुनाई-

शर्म आ रही है ना 
उस समाज को 
जिसने उसके जन्म पर 
खुल के जश्न नहीं मनाया 

शर्म आ रही है ना 
उस पिता को 
उसके होने पर जिसने 
एक दिया कम जलाया 

शर्म आ रही है ना 
उन रस्मों को उन रिवाजों को 
उन बेड़ियों को उन दरवाज़ों को 

शर्म आ रही है ना 
उन बुज़ुर्गों को 
जिन्होंने उसके अस्तित्व को 
सिर्फ़ अंधेरों से जोड़ा 

शर्म आ रही है ना 
उन दुपट्टों को 
उन लिबासों को 
जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ा 

शर्म आ रही है ना 
स्कूलों को दफ़्तरों को 
रास्तों को मंज़िलों को 

शर्म आ रही है ना 
उन शब्दों को 
उन गीतों को 
जिन्होंने उसे कभी 
शरीर से ज़्यादा नहीं समझा 

शर्म आ रही ना 
राजनीति को 
धर्म को 
जहाँ बार बार अपमानित हुए
उसके स्वप्न 

शर्म आ रही है ना 
ख़बरों को 
मिसालों को 
दीवारों को 
भालों को 

शर्म आनी चाहिए 
हर ऐसे विचार को 
जिसने पंख काटे थे उसके 

शर्म आनी चाहिए 
ऐसे हर ख़याल को 
जिसने उसे रोका था 
आसमान की तरफ़ देखने से

समाज में आप चाहे कुछ भी कहें, लेकिन प्रकृति ने समाज को चलाने की जिम्मेदारी उस लड़की को दी है। फिर भी हम बार-बार इस पर चर्चा चलती है।

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