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वसंत पंचमी 30 को लेकिन ऋतु 18 फरवरी से, पिछले 1000 सालों में कभी पंचमी से शुरू नहीं हुई वसंत ऋतु

  • इस वसंत पंचमी पर 6 राजयोग सहित बन रहे है 7 शुभ योग
  • पंचांग भेद के कारण 29 और 30 दो दिन मनाया जाएगा त्योहार
  • खरीदारी और विवाह आदि के लिए है अबूझ मुहूर्त

29 और 30 जनवरी को सरस्वती पूजा यानी वसंत पंचमी का त्योहार है। अमूमन पंचमी से वसंत ऋतु की शुरुआत मानी जाती है लेकिन हकीकत ये है कि पिछले 1000 सालों में कभी भी वसंत पंचमी से वसंत ऋतु की शुरुआत नहीं हुई। इस बार भी वसंत पंचमी 30 जनवरी (पंचांग भेद के कारण कहीं-कहीं 29 जनवरी) को पंचमी का उत्सव रहेगा, लेकिन वसंत ऋतु की शुरुआत 18 फरवरी से होगी। इस बार सरस्वती पूजा का उत्सव बहुत खास भी है। ज्योतिष की दृष्टि से देखें तो पंचमी तिथि पर 6 राजयोग सहित 7 शुभ योगों का निर्माण हो रहा है। जो खरीदारी, मांगलिक कार्य, व्यापार और विद्या आरंभ सहित सारे शुभ कामों के लिए बहुत ही अच्छा संयोग हैं। सनातन परंपरा में मान्यता है कि वसंत पंचमी पर उन बच्चों का विद्यारंभ संस्कार कराया जाता है, जो पहली बार स्कूल जाने वाले हैं।

ऋतु : वसंत पंचमी 30 को, लेकिन बसंत की शुरुआत 18 फरवरी से

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिषाचार्य पं. गणेश मिश्रा के अनुसार प्राचीन काल से ही जब सूर्य मीन या मेष राशि में प्रवेश कर जाता है, तब बसंत ऋतु मनाई जाती थी। लेकिन वर्तमान कैलेंडर के अनुसार, इसकी तारीख 18 और 19 फरवरी होती है। पिछले 1000 सालों में वसंत पंचमी पर कभी वसंत ऋतु की शुरुआत हुई ही नहीं। यानी वसंत पंचमी कभी वसंत ऋतु में नहीं आई, बल्कि ये पर्व मां सरस्वती की पूजा के लिए महत्वपूर्ण है। इस दिन देवी सरस्वती के प्रकट होने से इसे श्री पंचमी कहा जाता था।

ज्योतिष से : इस बार वसंत पंचमी पर 6 राजयोग समेत 7 शुभ योग

ज्योतिषाचार्य गणेश मिश्राा के अनुसार इस साल वसंत पंचमी पर सूर्य और बुध से मिलकर विद्या योग बन रहा है। इसके अलावा अन्य 6 राजयोग भी बन रहे हैं। इस तरह ज्योतिष के नजरिये से भी वसंत पंचमी पर्व बहुत खास हो गया है। वसंत पंचमी पर विद्या योग बनने से विद्यारंभ संस्कार महत्वपूर्ण हो जाएगा। इसलिए जो माता-पिता इस साल से अपने बच्चों की शिक्षा शुरू करना चाह रहे हैं। वसंत पंचमी पर उनके लिए सरस्वती पूजा विशेष फलदायी रहेगी। वहीं 6 राजयोग बनने से खरीदारी या कोई भी मांगलिक कार्य करने के लिए ये दिन शुभ रहेगा।

राजयोगों के नाम – 

1. वरीष्ठ योग –  मकर राशि में सूर्य और मीन राशि चंद्रमा होने से 

2. गजकेसरी योग – बृहस्पति और चंद्रमा से 

3. शश योग – मकर राशि में शनि होने से

4. शुभकर्तरी योग – बुध,गुरू और शुक्र से मिलकर

5. विमल योग – बृहस्पति के कारण

6. सुमुख योग – शनि के प्रभाव से

धर्मसिंधु ग्रंथ : 30 जनवरी को वसंत पंचमी मनाना श्रेष्ठ

पं. मिश्रा का कहना है कि बुधवार 29 जनवरी को सुबह 8.18 बजे से पंचमी तिथि लग रही है, जो गुरुवार 30 जनवरी को सुबह 10.28 बजे तक रहेगी। धर्मसिंधु ग्रंथ के अनुसार उदया तिथि के कारण 30 जनवरी को ही वसंत पंचमी मनाई जाएगी। यानी 30 तारीख को पंचमी तिथि में सूर्योदय होने से इसी दिन वसंत पंचमी पर्व मनाना श्रेष्ठ रहेगा।

मान्यता : 3 ऋतुएं देवताओं की, 3 ऋतुएं पितरों की

वसंत ऋतु के बारे में पं. मिश्रा ने बताया, यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ में वसंत, ग्रीष्म और वर्षा को देवताओं की ऋतु कहा गया है। इन दिनों में प्रकृति में सृजनात्मक बदलाव होने लगते हैं और बुद्धि-विचारों का विकास होता है। वहीं शरद, हेमंत और शिशिर पितरों की ऋतुएं हैं।

सरस्वती : शब्द का अर्थ, महत्व और पूजा 

वसंत पंचमी देवी सरस्वती का प्राकट्य उत्सव है। पं. मिश्रा के अनुसार सरस्वती शब्द संस्कृत शब्दावली में सृ धातु और असुन प्रत्यय से मिलकर बना है। इसमें सरस का शाब्दिक अर्थ है गतिशीलता। इसका संबंध जल के अलावा ज्ञान और वाणी से भी है। इसलिए देवी सरस्वती को ज्ञान और वाणी की शक्ति के रूप में पूजा जाता है।

मार्कंडेय पुराण : महाकाली, महालक्ष्मी और सरस्वती की पूजा के महीने बताता श्लोक

महाकालीदेव्याः पूजा चैत्रे आश्विने वा मासे शुक्लपक्षस्य नवम्यां तिथौ भवति। 

महालक्ष्मीदेव्याः पूजा कार्तिकमासस्य अमावास्यायां भवति। 

तेन प्रकारेण एव महासरस्वतीदेव्याः पूजा माघमासस्य शुक्लपक्षस्य पञ्चम्यां तिथौ भवति।

अर्थ –  उज्जैन के महिर्षि पाणिनी विश्वविद्यालय के शास्त्री पं. हरिओम शर्मा के अनुसार महाकाली की पूजा चैत्र और अश्विन मास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि को की जाती है। महालक्ष्मी की पूजा कार्तिक मास की अमावस्या को करना श्रेष्ठ है। उसी तरह देवी सरस्वती की पूजा माघ महीने के शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि पर करना श्रेष्ठ है।

सरस्वती के साथ विद्या और ज्ञान का पहला कदम पड़ा

  • पं. मिश्रा के अनुसार चैत्र प्रतिपदा पर ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी और वसंत पंचमी पर ज्ञान की देवी मां सरस्वती को प्रकट कर इस सृष्टि में चेतना भर दी थी। वसंत पंचमी की कहानी कई जगह आती है। पुराण कहते हैं कि ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की। वे बहुत प्रसन्न थे। लेकिन, कुछ दिनों में उन्होंने पाया कि सृष्टि के जीव नीरसता से जी रहे हैं। कोई उल्लास, उत्साह या चेतना उनमें महसूस नहीं हो रही है। उन्होंने भगवान विष्णु से विमर्श किया और फिर कमंडल से थोड़ा जल भूमि पर छिड़का। उस जल से सफेद वस्त्रों वाली वीणाधारी सरस्वती प्रकट हुईं। उन्हीं के साथ भूमि पर विद्या और ज्ञान का पहला कदम पड़ा, वह वसंत पंचमी का दिन था। इसलिए, इसे ज्ञान की देवी के प्राकट्य का दिन कहा जाता है।
  • मैहर के संगीत महाविद्यालय के प्राचार्य सुरेश चतुर्वेदी के अनुसार माघ मास की पंचमी तिथि पर देवी सरस्वती के प्राकट्य पर देवताओं और ऋषि-मुनियों में उल्लास और आनंद छा गया था। ऐसी स्थिति में उनके द्वारा देवी की स्तुति की गई। इन वेदों की ऋचाओं से आगे चलकर वसंत राग बना। चुंकि संस्कृत में उल्लास और अानंद की स्थिति को वसंत कहा गया है। इसलिए देवी सरस्वती के प्रकट होने पर इस पंचमी को वसंत पंचमी कहा जाने लगा।

संगीत दामोदर ग्रंथ से : बसंत ऋतु के लिए बना बसंत राग

छह प्राचीन रागों में इसे दूसरा राग माना गया है। पहला प्राचीन राग भैरव है। पहल कुछ संगीत ग्रंथों के अनुसार इस बसंत राग की उत्पत्ति पंचवक्त्र शिव यानी पंचमुखी शिव के पांचवें मुख से मानी जाती है। संगीत दामोदर ग्रंथ के अनुसार, श्रीपंचमी से हरिशयनी एकादशी तक बसंत राग गा सकते हैं, लेकिन संगीत दर्पण ग्रंथ के अनुसार इसे बसंत ऋतु में ही गाना चाहिए।

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