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कश्मीरी पंडितो के विस्थापन पर बनी फिल्म ‘शिकारा’ सिर्फ फिल्म नहीं, बल्कि अभियान है

तीन दशक पहले कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से बेदखल करने से पहले काफी जुल्म ढाए गए थे। जुल्म की वह दास्तान इतनी लंबी और गहरी है कि लिखने को पन्ने कम पड़ जाएंगे। इसीलिए, शिकारा फिल्म नहीं अभियान है…। सात फरवरी को रिलीज होने जा रही बहुचर्चित फिल्म शिकारा के निर्माता-निदेशक विधु विनोद चोपड़ा ने दैनिक जागरण से कहा, विस्थापन का भुग्तभोगी मेरा परिवार भी रहा है। जो होना था हो गया, अब तो कुछ ठीक हो जाए…।

उस त्रासदी पर कहते हैं, आप कल्पना कीजिए कि एक दिन आप सो कर उठें और आपके दरवाजे के बाहर चस्पा हो कि शहर छोड़कर चले जाओ वरना गोली मार दी जाएगा। यह सोचकर ही दिल दहल उठेगा। हमारे साथ ऐसा हुआ है। यह हुआ कैसे और इसे होने कैसे दिया गया? जैसे सवाल अनुत्तरित हैं। तीस साल तक किसी ने सुनवाई नहीं की, यह विडंबना है। 19 जनवरी 1990 को चार लाख कश्मीरी पंडितों के जबरन विस्थापन पर तीस साल बाद विधु विनोद चोपड़ा ने फिल्म ‘शिकारा’ का निर्माण किया है।

इतने अंतराल के बाद क्यों? कहते हैं, वर्ष 1989 में परिंदा के प्रीमियर के लिए मुंबई आई मेरी मां दोबारा कश्मीर स्थित अपने घर नहीं लौट सकीं। हालांकि दस साल बाद ‘मिशन कश्मीर’ की शूटिंग के दौरान मैं उन्हें अपने साथ कश्मीर ले गया था। तब वहां अपने उजड़े घर को देखने के अलावा उन्हें और कुछ नहीं मिला, सिवाय यादों के। मौसी के बेटे को उग्रवादियों ने मार डाला था। इस सदमे में मौसी की आवाज चली गई। मां ने ही मुझसे कहा था कि मैं कश्मीरी पंडितों के विस्थापन पर फिल्म बनाऊं ताकि दुनिया हमारे दर्द को महसूस कर सके। वर्ष 2007 में उन्होंने यह आग्रह किया था और उसी साल उनका निधन हो गया। कश्मीर में हमारा घर था। मेरी मां अपने घर नहीं लौट सकीं, मैंने उन्हें टूटते हुए देखा है। फिल्म में पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो का भड़काऊ भाषण भी दिखाया गया है।

विधु कहते हैं कि हमें यह नहीं कहना चाहिए कि पाकिस्तान ने नफरत फैलाई। उनके चंद नेताओं ने नफरत फैलाने का काम किया क्योंकि बेनजीर को भी तो सरेआम मार दिया गया। नफरत से कुछ हासिल नहीं होता है। हो सकता है कि मेरे अंदर गांधीगीरी ज्यादा समा गई है, लेकिन गांधी पर मेरा अटल विश्वास है। कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के संबंध में विधु विनोद चोपड़ा कहते हैं, हम लौटें भी तो रहना उन्हीं के साथ है, लिहाजा हमें उनकी सोच को भी बदलना होगा। फिल्म में क्या है? कहते हैं मेरी मां और मेरी अपनी जिंदगी के कई सीन हैं। रिफ्यूजी कैंपों में रहा, तथ्य जुटाए। लिहाजा त्रासदी का पूरा सच फिल्म में है। फिल्म में टमाटर वाला सीन भी असल में हुआ था। मैंने 56 साल की उम्र में इस फिल्म को लिखना प्रारंभ किया था। 67 की उम्र में खत्म किया। फिल्म यह सोचकर नहीं बनाई कि देश में वैसी लहर है तो बना लो।

अब तो ठीक कर दो…

विधु ने कहा, फिल्म में एक सीन है कि जब कश्मीरी पंडितों को विस्थापित कर दिया जाता है तो एक किरदार कहता है कि पार्लियामेंट में शोर मचेगा। सबको उम्मीद थी कि शोर मचेगा, पर तीस साल तक शोर मचा नहीं। तीस साल में अलगअलग सरकारें आई। उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। उस वक्त सरकार ने क्यों ठोस कदम नहीं उठाया, यह जवाब तो सरकार को ही देना होगा। एक सरकार को दूसरी सरकार पर आरोप नहीं लगाना चाहिए। मेरी गुजारिश है कि इतना समय निकल गया, अब तो कुछ ठीक कर दो। मेरी चाहत है कि सभी सांसद इस फिल्म को देखें और कुछ शोर मचाएं, जो तीस साल में नहीं हुआ, हो जाए। हम दुनिया के मुद्दे उठाते हैं पर अपनों के लिए चुप क्यों रहे?

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Written by Bhanu Pratap

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