in

हम कचरे जैसे हैं, कोई हमारी नहीं सुनता’: लॉकडाउन भारत से छनकर घर पहुंचे मजदूर

ज्यादातर दिन आप दयाराम कुशवाहा और उनकी पत्नी ज्ञानवती को नई दिल्ली (New Delhi) के उत्तरी उपनगर (northern suburb) में राजमिस्त्रियों को ईंट पकड़ाते हुए पाएंगे. वे अपने 5 साल के बेटे को साथ लाए हैं, जो उस समय धूल में खेलता है, जब वे काम करते हैं.

लेकिन अब उस खटखट की आवाज से भरी रहने वाली कंस्ट्रक्शन साइट (construction site) पर सन्नाटा पसरा रहता है, जिसे नए कोरोना वायरस (Coronavirus) के प्रसार को रोकने के लिए शेल्टर में बदल दिया गया है. साइट मैनेजर अब उन चौराहों पर नहीं आते जहां दयाराम और दूसरे कई काम शुरू होने की उम्मीद करते खड़े हैं.

300 मील गांव जाने के लिए चल देते हैं दयाराम
ऐसे में अपने परिवार (Family) को खिलाने और अपना किराया चुका पाने का कोई रास्ता न देखते हुए, दयाराम अपने बेटे शिवम को कंधे पर उठाते हैं और 300 मील दूर उस गांव की ओर चलने लगते हैं, जहां उनका जन्म हुआ था.वे यह न सोचने की कोशिश करते हैं कि उसके बाद क्या होगा, जब वे एक बार वहां पहुंच जाएंगे, वह भी खाली जेब. जबकि वे उनकी मदद के लिए घर (Home) पैसा भेजा करते थे, जो वहां छूट गए हैं. कम से कम उनके पास घर तो होगा.

पुलिस वाले एक्सप्रेस वे पर भी लॉकडाउन की एहतियात के पालन के लिए हैं प्रतिबद्ध
अगले दिन शाम तक, दयाराम और उनके बड़े परिवार के करीब 50 दूसरे लोग एक खाली पड़े एक्सप्रेसवे (Expressway) पर पहुंचते हैं, जो राजधानी से दक्षिण की ओर जा रहा है.

परिवार भूखा, प्यासा और थका हुआ है और पुलिस कभी भी दूर नहीं रही है. हर समय वे आराम के लिए रुकते हैं तो अधिकारी उन पर आगे बढ़ते रहने के लिए चिल्लाते हैं. वायरस को फैलने से रोकने के लिए वे उनसे दूर-दूर रहने को कहते हैं. अधिकारी लॉकडाउन (Lockdown) के आदेशों को लागू करने के आदेशों के अधीन हैं लेकिन उस दिन वे लोगों को जाने दे रहे थे.

नहीं उठा सकते दो बच्चों को घर, एक बेटे को रिश्तेदारों के पास छोड़ा
28 साल के दयाराम चारों ओर देखते हैं. हजारों अन्य प्रवासी मजदूर ऐसा ही कर रहे हैं. 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन (Partition) के बाद से देश में यह एक सबसे बड़ा जनसंख्या विस्थापन है.

बारिश होने लगती है. दयाराम का दिमाग अपने बेटे पर जाता है, 7 साल का मंगल, जिसे उन्होंने अपने बुजुर्ग रिश्तेदारों (Relatives) के पास गांव में छोड़ दिया है क्योंकि दो बच्चों की देखभाल करना बहुत कठिन है क्योंकि वे और उनकी पत्नी दोनों काम करते हैं. उन्हें उसकी याद आती है.

एक महामारी (pandemic) के बीच, केवल एक ही सांत्वना की बात है, “कम से कम मैं उनके साथ होऊंगा.”

दशकों से, पूरे भारत से लोग गांव छोड़ रहे हैं
बहुत से लोगों के लिए यह फैसला सीधा गणित है- घर पर रहकर करीब 200 रुपये प्रतिदिन कमाने बजाए 400 रुपये प्रतिदिन कमाने के लिए. मध्य प्रदेश राज्य के सूखे से प्रभावित बुंदेलखंड (Bundelkhand) जैसे इलाके में, जो कि दयाराम के पुरखों का घर रहा है, बारिश लगातार कम होते जाने के साथ-साथ जीविका के लिए केवल जमीन पर निर्भर रहना मुश्किल होता जा रहा है.

दूसरे लोगों को कुछ और चीजें खींचती हैं जैसे पलायन की संभावना जो किसी बड़े शहर (Big City) की ओर खींचती है.

शटडाउन के बाद शहर खाली, पैदल घर जा रहे हजारों प्रवासी
लेकिन शटडाउन (Shutdown) के बाद शहर खुद ही खाली हो गये हैं. दयाराम और उनका परिवार सबसे पहले वहां से निकलने वालों में से हैं. जैसे-जैसे दिन गुजरते हैं और परिस्थितियां और ज्यादा कठिन होती जाती हैं, सैकड़ों और हजारों प्रवासी मजदूर फैक्ट्रियों और काम की जगहों से निकल कर घर के रास्ते पर चल देते हैं.

भारतीय अधिकारियों (Officers) ने कहा है कि करीब 130 करोड़ की जनसंख्या वाले और बड़े स्तर के प्रसार को न झेल पाने वाले स्वास्थ्य के बीमार बुनियादी ढांचे वाले इस घने बसे देश में कोरोना वायरस को मात देने के लिए लॉकडाउन जरूरी है.

Report

What do you think?

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading…

0

चीन ने ठुकराया अमेरिका का यह प्रस्ताव, तीसरे विश्व युद्ध को दिया न्योता

इंदौर में कोरोना से निपटने के लिए भीलवाड़ा मॉडल, हर घर जाकर टीमें पूछेंगी चार सवाल